लघु कथा “तमाचा

लघु कथा
“तमाचा”
आज दहेज पृथा के विषम दौर में जब अर्थ के समक्ष मानवता मानवीय, संवेदनायें, रिश्ते, भाई चारा आपसी प्रेम व्यौहार, सभी कुछ मूल्य हीन हो तब ऐसे परिवेश में यदि कोई दहेज़ की तो बात ही नहीं अपंगता को भी जीवन भर साथ निभाने का संकल्प ले, यह आज दौर में अपवाद ही है, और हुआ भी ऐसा ही है!
महोबा एक छोटा सा कस्बा एक देवेश नाम का लड़का इन्टर कालेज में लेक्चरार के पद पर नियुक्त था, अच्छा वेतन था, परिवार भी धनाढ्य था, किसी चीज की कोई कमी नहीं थी, उसकी शादी के लिए कई आफर आये, चूंकि देवेश धनाढ्य फेमली के साथ साथ अच्छी पोष्ट पर होने के कारण शिक्षित एवं धनाढ्य रिश्ते ही आते थे, लेकिन देवेश हर बार इन्कार करता, वह यह चाहता था कि लड़की ऐसी मिले जो शिक्षा के क्षेत्र से ही हो, शौभाग्य से उसे ऐसी लड़की मिल गई, किन्तु वह सामान्य परिवार से थी मगर उच्च शिक्षित थी, सम्बन्ध तय हो गया , शादी की तिथि भी तय हो गई, इस सम्बन्ध से देवेश का परिवार न खुश था,
होनी अनहोनी कोई नहीं जानता लेकिन ईश्वर आपकी परीक्षा जरूर लेता है, होने वाली मंगेतर रागनी का रोड चलते एक्सीडेंट हो गया और रीढ़ की हड्डी में फ्रेक्चर हो , सुशुष्म्ना में चोट आ गई और दोनों पैर शुन्य हो गये, शादी की तिथि आ गई मूल मुहूर्त के दिन देवेश के माता पिता के मना करने के बाबजूद देवेश अस्पताल अपने दो चार दोस्तों के साथ गया और स्ट्रेचर पर ही रागनी संग जय माला पहना कर भगवान को साक्षी कर, जीवन भर साथ निभाने का संकल्प लिया न दहेज न बाजे गाजे, सिर्फ अस्पताल में सभी को मिष्ठान खिलाकर आशीर्वाद लिया ! आज के दौर में यह उदाहरण लोभी लोगों के गाल पर तमाचा है
रचना कार- सुभाष चौरसिया हेम बाबू महोबा

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