उसका दर्द कौन समझे ??

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🤔उसका दर्द कौन समझे ??🤔
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अपना दर्द छुपा वह नारी,
वह अपनों के लिए जीती है।
फिर क्यूँ ये ज़ालिम दुनिया,
उसे बेवफ़ा और वेश्या कहती है।
खड़ी थी वह कोठे पर फ़िर भी,
अपना ज़मीर साथ रखती थी।
पुरुषों के बाज़ार में बिकती रही,
लेकिन सम्मान साथ रखती थी।
उसके भी अपने थे कोई दुनिया में,
जो अपने जिस्म से भी कीमती थे।

उनकी आबरू की ख़ातिर उसने,
ख़ुदको बेचना शुरू कर दिया।
जिस्म की कीमत लगाते रहे वो,
ये अपनों की ख़ातिर बिकती रही।
कौन कहता है अपने नहीं होते,
इनका तो जहान ही अलग सा है।

वह जिस्म ख़रीदकर ख़ुश होता रहा,
तो इसे ख़ुदको मजबूरी में बेचना पड़ा।
वह पैसे लुटाता रहा कमसिन जिस्म पर,
ये लूटती रही कोठे पर अपनों की ख़ातिर।
कितना बुरा भला कहा गया हर पल उसे,
कितने इल्ज़ाम भी सबसे उसे सहने पड़े।
पर मुँह सील देती है तब वह सबके,
बात जब अपनों के रक्षा की होती।

क्या करे अब और कहाँ जाए वह,
ख़ुदको दरिंदों से अब कैसे बचाए।
जब रक्षक ही उसके भक्षक बन जाए,
अपना माना जिसे वे व्यापारी बन जाए।
उसके एक एक आँसू और दर्द के बदले,
उसके अपने ही सरेआम क़ीमत लगाए।
ज़रा सोचो तो कहाँ जाए वह स्त्री अब,
जब अपने ही बैठा जाए उसे कोठे पर।

दर्द से टूट सी जाती वह नारी फ़िर भी,
आह तक भी न मुख से निकाल पाए।
चरित्रहीन कहकर उसपर लांछन लगाए,
फ़िर कहो वह भागकर भी कहाँ जाए।
शर्म बेच खाई अब तो उन पुरुषों ने भी,
और बेशरम हर बार एक नारी कहलाए।
कैसा बेरहम समाज और ज़माना है यह,
दर्द किसी का भी खुलकर देख न पाए।

गीतिका पटेल “गीत”
कोरबा, छत्तीसगढ़
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