स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा

गीत/विवेक दीक्षित

*स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा!*
*सब तुम्हारे लिए,बस तुम्हारे लिए!*
*यज्ञ-तप-साधना, पुण्य-फल-कामना,*
*सब तुम्हारे लिए, बस तुम्हारे लिए!*

मैंने जिसको गढ़ा था, कभी स्वप्न में,
मूर्त उनको किया तुमने आकर प्रिये!
जब भी ठोकर लगी, लड़खड़ाए कदम,
तुमने विश्वास देकर ,उठाया मुझे!

*मैं चला-तुम चली,साथ चलने लगे,*
*मैं रुका-तुम रुकीं,बस हमारे लिए!*
*स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा!*
*सब तुम्हारे लिए,बस तुम्हारे लिए!*

मेरे आंगन की तुलसी का पौधा हो तुम,
जिसके आने से, पावन हुई देहरी!
युद्ध जीवन का लड़ने चला, पार्थ मैं,
मेरे रथ की हो तुम, कृष्ण सी सारथी!

*रथ समर में भटकने न देना प्रिये!*
*युद्ध मैं जीत लूंगा तुम्हारे लिए!*
*स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा!*
*सब तुम्हारे लिए,बस तुम्हारे लिए!*

नेह गंधों में लिपटी हुई पातियां,
मैं कभी भी तुझे लिख न पाया प्रिये!
प्रेम अभिव्यक्ति को शब्द ढूंढे बहुत ,
पर उचित शब्द ही मिल न पाया प्रिये!

*मेरा कवि होना धन्ये! वृथा हो गया,*
*गीत इक गढ़ न पाया, तुम्हारे लिए!*
*स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा!*
*सब तुम्हारे लिए,बस तुम्हारे लिए!*

सांस की लय भले टूट जाएगी कल,
प्रेम – संगीत झंकृत रहेगा सदा!
मृत्यु का देवता रुष्ट हो जाए पर,
आत्मा-आत्मा से न होगी जुदा!

*इस जनम,उस जनम और जन्मोजनम,*
*मैं तुम्हारा हूं ,तुम हो हमारे लिए!*
*स्वांस-मन-चेतना,प्राण-तन-आत्मा!*
*सब तुम्हारे लिए,बस तुम्हारे लिए!*

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