आसमाँ से जो उतर आई धरा पर, *सूर्य की पहली किरण का तेज हो तुम* ।
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस
पर समस्त महिलाओं को समर्पित है मेरी ये रचना ।
*सूर्य की पहली किरण का तेज हो तुम* (*नारी*)
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आसमाँ से जो उतर आई धरा पर,
*सूर्य की पहली किरण का तेज हो तुम* ।
बादलों की गोद से जो बून्द सागर में गिरी,
सीप से निकला हुआ मोती हो
तुम ।
और जब बहारें झूम के आईं
चमन में,
गुल भी हो कांटा भी हो शबनम भी तुम।
विश्व के इतिहास की इस भूमिका में,
माँ भी हो , बेटी भी हो बेगम
भी तुम।
जिसकी खातिर लवे जमुना पे
बना ताज महल,
वो शाहजहाँ की उल्फ़त मुमताज भी हो तुम।
जिसने कैश, महिवाल व फरहाद को बनाया आशिक
वो कभी शीरी, कभी सोनी कभी लैला हो तुम।
दुनियाँ को दिए हैं तोहफ़े जो
इंसान बनाकर,
कभी जीजा,कभी पन्ना कभी
मरियम हो तुम।
यहाँ राजा नल और सलीम की थी क्या विसात,
वो दमयंती व अनारकली की
वफ़ा हो तुम।
कोरोना महामारी में हाय हाय
है मची हुई,
डॉ0 रूप में हर जगह जीवित
भगवान हो तुम।
देश भक्ति का जज़्ज़बा लेकर
सीमा पर डटी हुई हो,
आंधी, तूफां, बारिश में सीना
ताने खड़ी हो तुम।
भरत भूमि की गौरव गाथा की ध्वज वाहक,
युगों, युगों से और अब भी
बनी हो तुम।
पति मोह पाश में रण भूमि से
लौट ना आये,
सिर काट कर भेजा अपना वही तो हाड़ा रानी हो तुम।
जब भी गरजी हो तो धरती
आकाश हिले हैं,
हर आंदोलन को नई धार देती हो तुम।
जल,थल,नभ को लांघ कर
हर पल,
नया इतिहास लिख देती हो तुम ।
हर रिश्ते में हर पल तुम तो
किश्तों में मरती हो,
अब, जागो दीवार पे लटकी हुई तस्वीर नहीं तुम।
खुशियों को बांटो राह में जख्मों को समेटो,
कि हर मर्द की किस्मत हो
जागीर नहीं तुम।
स्व रचित
मौलिक
सुलोचना परमार “उत्तरांचली”
देहरादून (उत्तराखण्ड)
08,03,2021
7457855051